तेरी शर्ट हमसे ज्यादा सफ़ेद क्यों की तर्ज़ पर मीनारों और गुम्बदों को ऊँचा करने और सड़कों पर नमाज़ व आरती करने की आज होड़ लगी है.धार्मिक होने का प्रदर्शन खूब हो रहा है जबकि ऐसी धार्मिकता हमें धर्मान्धता की ओर घसीट ले जा रही है.जो खतरनाक है.देश की गंगा-जमनी संस्कृति को इससे काफी चोट पहुँच रही है.सर्व-धर्म समभाव हमारी पहचान है.सदियों पुरानी इस रिवायत को हम यूँही खो जाने नहीं देंगे. इस मंच के मार्फ़त हमारा मकसद परस्पर एकता के समान बिदुओं पर विचार करना है.अपेक्षित सहयोग मिलेगा, विशवास है. मतभेदों का भी यहाँ स्वागत है.वाद-ववाद से ही तो संवाद बनता है.





रिजवाना : संस्कृत की नयी इबारत

on गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

रिजवाना परवीन का साधिकार संस्कृत बोलना, इसे बस कर्मकांड की भाषा में ढाल चुके आभामंडित विद्वानों के लिए भी चुनौती है। यह संस्कृत शिक्षिका भाषायी संगम की, इसलिए साझा विरासत और साझा देश प्रेम की भी अनूठी मिसाल है। संस्कृत के बहुत जटिल व्याकरणीय संरचना और दो से तीन पदों तक की लंबाई के एक वाक्य वाले श्लोकों का मानक उच्चारण के साथ उनका सस्वर पाठ चकित कर देता है।



 




रास्ते भले अलग-अलग हों, मंजिल नहीं। 'रबबुल आलमीन'-[खुदा पूरी दुनिया का है] और ईश्वर भी एक है जिसे सभी मतावलंबी अलग-अलग रूप में व्याख्यायित करते है-यं शैवा समुपासते..।
ऐसे लोग भी है जो मानते है कि संस्कृत में इबादत कर लेने से खुदा और अरबी में प्रार्थना कर लेने से भगवान नाराज नहीं होगा। भाषाओं को बहुत कडे़ मजहबी यकीन के खांचों में न बांटकर उसे सभ्यता और संस्कृति [धर्म नहीं] की नजर से बरतने के कुछ साहसी मिजाजों का नुमाइंदा बन चुकी है, जहानाबाद की रिजवाना परवीन।
मध्य विद्यालय काको में पढ़ा रहीं रिजवाना परवीन का साधिकार संस्कृत बोलना, इसे बस कर्मकांड की भाषा में ढाल चुके आभामंडित विद्वानों के लिए भी चुनौती है। यह संस्कृत शिक्षिका भाषायी संगम की, इसलिए साझा विरासत और साझा देश प्रेम की भी अनूठी मिसाल है। संस्कृत के बहुत जटिल व्याकरणीय संरचना और दो से तीन पदों तक की लंबाई के एक वाक्य वाले श्लोकों का मानक उच्चारण के साथ उनका सस्वर पाठ चकित कर देता है।
1978 में संस्कृत शिक्षक के रूप में अपनी नियुक्ति काल से ही रिजवाना ने इस भाषा के अध्ययन और अध्यापन की अलख जगा रखी है। इस भाषा का सांस्कृतिक असर उनके परिवार पर भी दिखता है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे उनके बच्चे भी इस भाषा के अच्छे जानकार हैं।
एक पारंपरिक मुसलमान परिवार की रिजवाना का लगभग चार दशक पूर्व संस्कृत में शिक्षा हासिल करना किसी क्रांतिकारी कदम से कम नहीं था। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी रिजवाना ने 1971 में पटना के एक बोर्डिग स्कूल में दाखिला लेकर तो सबको चौंका ही दिया।
उन्होंने पटना स्थित एक स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उ‌र्त्तीण की। इस परीक्षा में संस्कृत के प्रति उनके स्वाभाविक लगाव के कारण सर्वाधिक नम्बर आये। परंपरावादियों को अभी और चौंकना था। स्कूल में ही वे स्काउट्स एवं गाइड्स में भर्ती हों गयी। उन्होंने यहां भी अपनी प्रतिभा बिखेरी।
रिजवाना को स्काउट्स में उत्कृष्ट कार्यो के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति वी. बी. गिरी ने प्रमाण पत्र देकर पुरस्कृत भी किया।
संस्कृत भाषा से अपने लगाव का श्रेय वे स्थानीय नर्स ताजमणि को देती हैं। उन्होंने बताया कि उनकी ही प्रेरणा से वे बोर्डिग स्कूल में भी भर्ती हुयीं। ताजमणि ने ही उनके पिता को उन्हें आगे की शिक्षा के लिए प्रेरित किया। रिजवाना बताती हैं कि 1973 में संस्कृत विषय के साथ मैट्रिक पास करने के बाद उनका इस भाषा के प्रति लगाव बढ़ता ही गया।
उन्होंने सोचा कि क्यों न इस सुन्दर भाषा से अन्य लोगों को परिचित कराया जाये। उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से उन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग की तथा संस्कृत शिक्षक के रूप में अपने कैरियर को आयाम दिया।
चलो रोते हुए बच्चों को हंसाया जाये-उन्होंने बस एक चीज पकड़ी है और सारे मजहब इसकी ताईद हैं- आदमीयत, दया-करुणा और प्रेम। इंसानियत के इन्हीं घटकों को लेकर बना है उनका व्यक्तित्व। वह गरीब व अनाथ बच्चियों को स्कूली किताब और जरूरी कपड़े तक मुहैया कराती हैं। चार अनाथ बच्चे तो बस उनकी ही मुहब्बत पर पल रहे है।



 जागरण में जहानाबाद [मध्य बिहार से] शशिकांत 

काश मिले मंदिर में अल्लाह मस्जिद में भगवान मिले.

on मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

*
अल्लाह के लिए न तुम भगवान के लिए

लड़ना है तो लड़ो सदा इन्सान के लिए
हर धर्म है महान हर मज़हब में बड़प्पन
लेकिन नहीं है अर्थ कुछ शैतान के लिए

अपना ये घर संवारो मगर ध्यान तुम रखो
हम वक्त कुछ निकालें इस जहान के लिए

*

सुबह मोहब्बत शाम महब्बत
अपना तो है काम महब्बत
हम तो करते हैं दोनों से
अल्ला हो या राम महब्बत

*
ऐसा कोई जहान मिले
हर चहरे पर मुस्कान मिले
काश मिले मंदिर में अल्लाह
मस्जिद में भगवान मिले.

*
और लगे हाथ ये दो शेर भी देख लें...


लहलहाती हुई जो फसल देखता हूँ
इसे मै किसी की फज़ल देखता हूँ
ये न उर्दू की है और न हिन्दवी की
ग़ज़ल को मै केवल ग़ज़ल देखता हूँ...................................गिरीश पंकज





कवि-परिचय
शुरू से ही साहित्य और कला-संस्कृति के लिए खून-ऐ-जिगर करने वाले गिरीशजी ने आख़िर उस पेशे से मुक्ति पा ही ली जिसे पत्रकारिता कहते हैं.भला, आप जैसा संवेदनशील और विवेकी शायर-कवि, लेखक-संपादक, समीक्षक-व्यंग्यकार वहाँ रह भी कैसे सकता है.अखबार में रह कर भी आपने ज़मीर से समझौते कभी नहीं किए.और अपनी प्रतिबद्धता बरक़रार रखी.छत्तीसगढ़ के मूल निवासी पंकज जी फिलहाल साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, के सदस्य और छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,के प्रांतीय अध्यक्ष हैं। रायपुर में रहते हुए भारतीय एवं विश्व साहित्य की सद्भावना दर्पण जैसी महत्वपूर्ण अनुवाद-पत्रिका और बच्चों के लिए बालहित का सम्पादन-संचालन बरसों से कर रहे हैं
अब तक आपके
३ उपन्यास- मिठलबरा की आत्मकथा, माफिया, पालीवुड की अप्सरा , 8 व्यंग्य-संग्रह- ट्यूशन शरणम गच्छामि, ईमानदारों की तलाश, भ्रष्टाचार विकास प्राधिकरण, मंत्री को जुकाम, नेताजी बाथरूम में, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाये, मूर्ति की एडवांस बुकिंग एवं हिट होने के फार्मूले, २ ग़ज़ल संग्रह- आंखों का मधुमास, यादों में रहता है कोई सहित 31 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है.-सं.

भगवान् की हांडी!

on शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009






संस्कृति
के चार अध्याय जैसी अमर-कृति के रचयिता और अपने समय के चर्चित लेखक-कवि रामधारी सिंह दिनकर की इधर तीन पुस्तक पढने का सुयोग मिला.पुस्तकें हैं: स्वामी विवेकानंद, हे राम! और लोकदेव नेहरू.
मैं उन्हीं पुस्तकों के हवाले से आज बात करूंगा.उन्हों ने जो कल लिखा था, उसकी प्रसांगिकता आज भी उतनी ही है.आप लिखते हैं:
अब हम वेदांती हैं, हम पौराणिक या तांत्रिक रह गए हैं.अब तो हम मात्र छुआ -छूत पंथी-भर शेष रह गए हैंहमारा धर्म सिमट कर रसोई में क़ैद हो गया है और मात्र रान्धने की हांडी हमारा भगवान् बन गई है तथा मज़हब यह विचार हो गया है कि हमें कोई छुए नहीं, क्योंकि हम पवित्र हैं.

ये बात सिर्फ़ सनातनियों पर ही लागू नहीं होती.इस्लाम और ईसाई जैसे और दीगर मज़हबों के माने वालों के यहाँ भी कमोबेश यही स्थिति है.हम धार्मिक रह ही नहीं गए हैं.गर धार्मिक हो जाते तो साम्प्रदायिकता का ख़ुद-बखुद लोप हो जाता.ज़ाती-धर्म के नाम पर बंट रहे समाज के लिए ज़रूरी है.लेकिन हम धर्मांध हो गए हैं.धर्म महज़ प्रदर्शन की चीज़ है.साम्प्रदायिक होने में धर्म की इतिश्री समझते हैं.साझे--सरोकार की बात आज बेईमानी लगती है.जबकि:
इस्लामी साधना के रहस्य को समझने के लिए परमहंस कुछ दिनों तक मुसलमान हो गए थे और ईसाईयत के मर्म को समझने के लिए थोड़े दिनों के वे ईसाई भी बन गए थे.महायोगी अरविन्द और महर्षि रमन भी धर्म के अनुष्ठानिक पक्ष को महत्त्व नहीं देते थे.इन दोनों महात्माओं के भक्त बहुत से ईसाई , पारसी और मुसलमान भी हुए हैंकिंतु किसी भी भक्त से उनहोंने यह नहीं कहा कि मोक्ष-लाभ के लिए हिंदू होना आवश्यक है

हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना धर्म का बाहरी रूप है। सच्चा धर्म वोह है जिसके नाम लेने पर हिंदू पहले अच्छा हिंदू और मुसलमान पहले अच्छा मुसलमान हो जाता है.जो धर्मांध बनने वाली किसी विचारधारा या धर्म की बात करते हैं वो दरअसल साम्प्रदायिकता के घोर प्रचारक और प्रसारक होते हैं.और ऐसे लोग हर समाज-समुदाय में आजकल बहुतायात से मिल जाते हैं.हमें उनसे होशियार रहने की ज़रूरत है।

सम्प्रदायवादी किसी अतीत के अवशेष हैं वे तो भूत में बसते हैं, वर्तमान में, वे हवा में लटके हुए हैं.भारत हर आदमी को बर्दाश्त करता है, हर चीज़ को बर्दाश्त करता है, यहाँ तक कि पागलपन भी बर्दाश्त करता है, इसलिए सम्प्रवादी भी इस देश में हैं.मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी विचारधारा खतरनाक है यह विचारधारा घृणा से भरी हुई है .यह प्रवृति भारत के लिए अकल्याण कारी है.चाहे हिंदू साम्प्रदायिकता हो या मुस्लिम साम्प्रदायिकता या सिक्ख साम्प्रदायिकता......अगर ये कायम रही तो भारत की धज्जियां उड़ जायेंगी और वोह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा

हम त्रासद विभाजन पहले ही भोग चुके हैं.भाषा और जाती, धर्म के नाम पर रोज़ विभाजित हो रहे हैं.किसी को हम अपनी जाती के नाम पर जबतक पालते-पोसते रहते हैं वो हमें साम्प्रदायिक नहीं लगता लेकिन जब वो अपनी भाषा के नाम पर मुझ से ही झगड़ने लगता है तो हमें वो तुरंत ही साम्प्रदायिक लगने लगता है.हमें ऐसे चिन्हों को ख़ुद में भी टटोलना ज़रूरी है,जभी हम सुंदर-समाज की रचना कर सकते हैं.

हम चाहे किसी भी मज़हब के मानने वाले हों, हम समान रूप से भारत-माता की संतान हैं.साप्रदायिकता को संकीर्णता को हम बढ़ावा नहीं दे सकते क्योंकि जिस किसी देश के नागरिक मन, वचन या कर्म से संकीर्ण हैं , वोह देश कभी भी ऊपर नहीं उठेगा.
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