तेरी शर्ट हमसे ज्यादा सफ़ेद क्यों की तर्ज़ पर मीनारों और गुम्बदों को ऊँचा करने और सड़कों पर नमाज़ व आरती करने की आज होड़ लगी है.धार्मिक होने का प्रदर्शन खूब हो रहा है जबकि ऐसी धार्मिकता हमें धर्मान्धता की ओर घसीट ले जा रही है.जो खतरनाक है.देश की गंगा-जमनी संस्कृति को इससे काफी चोट पहुँच रही है.सर्व-धर्म समभाव हमारी पहचान है.सदियों पुरानी इस रिवायत को हम यूँही खो जाने नहीं देंगे. इस मंच के मार्फ़त हमारा मकसद परस्पर एकता के समान बिदुओं पर विचार करना है.अपेक्षित सहयोग मिलेगा, विशवास है. मतभेदों का भी यहाँ स्वागत है.वाद-ववाद से ही तो संवाद बनता है.





ब्लाग जगत की सबसे अच्छी प्रतिक्रिया यहाँ देखिये !

on शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

२५ सितम्बर को फिरदौस ने लगता है अत्यन्त दुखी होकर एक पोस्ट लिखी " मार दो गोली, हिन्द के तमाम मुसलमानों को" उनके जवाब में बहुत से जागरूक साथियों ने प्रतिक्रियाएं दीं !

डॉ सुभाष भदौरिया, अपने देश भक्ति पूर्ण विचारों को व्यक्त करने के लिए मशहूर , एक बेहद तीखे ब्लागर, का, फिरदौस के उपरोक्त पोस्ट पर जाकर निम्न कमेंट्स देना ...

"कैसे कह दें कि तुम पराये हो,
तुम से नाता बहुत पुराना है।
तुम दिवाली पे अब के आ जाइयो,
ईद पे हम को अब के आना है।
आप की पोस्ट रुला गयी। ऐसी दिल तोड़ने वाली बातें मत कहिये "


डॉ सुभाष भदौरिया की हार्ड लायनर छबि और ऐसी मार्मिक अपील की पोस्ट लिखना , जैसे कोई सगा भाई, अपनी रोती हुई बहिन को मनाने की कोशिश कर रहा हो......

मैं भौचक्का रह गया , और अपने उस निर्णय के प्रति, जब कुछ लेख पढ़कर , मैंने डॉ सुभाष भदौरिया के ब्लाग पर ना जाने का फ़ैसला किया था ! हम कितने मूर्ख होते हैं कि दूसरे को ग़लत मानने से पहले, उसको अपना स्पष्टीकरण देने का मौका भी नही देते ! सोचने का सबका अपना नजरिया होता है और हमें विरोध का भी सम्मान करना आना चाहिए !

अपनी मूर्खता पर पछताते हुए हुए डॉ भदौरिया को मैंने यह मेल लिखा ...
" फिरदौस के ब्लॉग पर आपके यह कमेंट्स पढ़ कर यकीन नही हुआ कि यह वाक्य आपके ही हैं ! अतः दिल किया कि पहले मैं आपके प्रति ग़लत विचार रखने के लिए, आपसे क्षमा मांग लूँ !...बहुत पहले एक बार आपके ब्लॉग पर आया था, आपका लिखा कुछ पढ़ कर, आपके व्यक्तित्व के बारे में धारणा बना कर यहाँ से गया था, उसके बाद आपके ब्लाग पर नही आया ! हम लोग अक्सर यही गलती करते हैं, और अगर गलती का अहसास भी हो जाए तो भी गलती कभी नही मानते ! "

सुभाष जी का तुंरत जवाब आ गया !
"सतीशजी मैं पहले याहू पर लिखता था कुछ मित्रों के सुझाव से कि गुग्गल पर प्राया हिन्दी के रचनाकार हैं यहाँ विचारविनमय होगा इस दृष्टि से गुग्गल पर ही लिखने लगा। यहाँ देखा कि लोग खेमें में बँटे हुए आत्मरत हैं. जिस ग़ज़ल के अशआर आपने फिरदौस के ब्लाग पर पढ़े ये ग़ज़ल याहू पर इस पते पर प्रकाशित है. आपने मेरे बारें में धारणा बदली,अच्छी बात हैं.आप सह्रदय रचनाकार हैं आपके ब्लाग पर जाकर देखा तो ज्ञात हुआ.

पर हमारी सह्रदयता को कायरता मान कोई हिमाकत पर हिमाकत करता जाये तो रोष आता ही है।मैथलीशरणगुप्त ने जयद्रथ-वध खंड काव्य में सच ही कहा है-
निज शत्र का साहस कभी बढ़ने न देना चाहिए
बदला समर में बैरियों से शीघ्र लेना चाहिए।
पापीजनों को दंड देना चाहिए सचमुच सदा,
वरवीर क्षत्रियवंश का कर्तव्य है ये सर्वदा।
आपने टिप्पणी के माध्यम से मुझे याद किया। कृतज्ञ हूँ श्रीमान। "

डॉ सुभाष भदौरिया जैसे बड़े दिल वाले इंसान ही हमारे देश की शान हैं ! ऐसे लोगों के कारण हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों के साथ फलता फूलता रहेगा !

करिश्मा कुदरत का..

on रविवार, 5 अक्तूबर 2008



असाध्य रोग को आसानी से ठीक करने वाली चमत्कारिक चिकित्सा पद्धति - होमिओपैथी !

सतीश सक्सेना की कलम से

आज जब मैं कई घटनाओं के बारे में सोचने लगा जिनका सम्बन्ध बीमारियों से है.तो सहसा ख्यालआया कि कट्टरता वादियों से पूछूं भैया इनका धर्म क्या होता है.और जो दर्द है वो किस सम्प्रदाय का है. और जैसे-जैसे बीती-गुज़री बातें सामने आती गयीं जानकार अद्भुत शांति मिली कि कई असाध्य रोगों का उपचार जडी-बूटियों से हुआ और होता है.और प्रकृति तो सभी पर समान रूप से कृपालु रही है.

-१९९९ की बात है, अलका सक्सेना, उम्र ३३ वर्ष, क्रोनिक स्लिप डिस्क (तीन जगह) से पीड़ित, दर्द के कारण चलने फिरने में असमर्थ , पैर और हाथों में सुन्नपन का असर , चिंतित डाक्टरों ने ओपरेशन ही एकमात्र उपाय, बताया और साथ ही यह भी कि पेरालेसिस का खतरा है ! इस स्थिति में एक दिन इसको होमिओपैथी की एक रात ४-५ चीनी की गोलियां दी गयीं और अगली सुबह पहली बार यह लडकी बिना किसी सहारे के बिस्तर से उठाकर आराम से अचंभित होकर अपने पैरों पर खड़ी थी, और यही नही ३ दिन बाद वह शोपरस्टाप में विना किसी सहारे घूमने भी गयी ! आज भी उसकी एम् आर आई रिपोर्ट देख कर कोई डॉ इसपर विश्वास नही करते हैं !

- जम्मू के एक परिवार ने अपने ३ वर्षीया अस्थमेटिक बच्चे को सिर्फ़ ३ बार मीठी गोलियां खाकर, इस बीमारी से सदा के लिए मुक्ति पा ली वे आज भी होमिओपैथी के भक्त है ! -उपरोक्त उदाहरण, किसी भी अच्छे होमिओपैथ के लिए एक साधारण बात है ! मगर होमिओपैथी को सैकडों वर्षों साइंस ने मान्यता प्रदान नही की क्योंकि इसके सिद्धांत साइंस की अवधारणाओं से मेल नही खाते थे और वर्षों इस क्वेकरी ही मानते रहे ! आइये आज होमिओपैथी को समझने का प्रयत्न करें ...

-पौराणिक काल की एक घटना मेरे हिसाब से होमिओपैथी का सटीक उदाहरण है, जब लक्ष्मण को मरणासन्न अवस्था में देख वैद्य सुषेण ने कहा था कि सिर्फ़ संजीवनी पौधे से बनी दवा ही इनको बचा सकती है, क्योंकि लक्ष्मण का तेजतर्रार व्यवहार सिर्फ़ इस पौधे के व्यवहार से ही मेल खाता था !

-पैगम्बर मोहम्मद ने भी जडी-बूटियों की महत्ता ब्यान की . उन्हों ने खजूर, मेथी, कलौंजी आदि का इस्तेमाल कई बीमारियों में किया और इसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आये.

-डॉ जगदीशचंद बसु का एक प्रयोग, वनस्पतियों में जीवन पर किया था और इसे प्रमाणित भी किया था, उन्होंने यह भी सिद्ध किया था कि उनमे संवेदना, सुख और दुःख को महसूस करने की वही शक्ति और स्वाभाव है जो कि हम व्यक्तियों में है !

- होमिओपैथी का सिद्धांत है कि अगर आप किसी बीमार व्यक्ति का स्वाभाव जानते हैं तो उसी स्वाभाव के पौधे से बनी औषधि उस व्यक्ति पर संजीवनी सा कार्य करेगी चाहे बीमारी कोई भी क्यों न हो !

-सैकडों वर्ष इन महान होमिओपैथ डाक्टरों ने पौधों से बनाई गयी दवाईयों को अपने शरीर पर प्रयोग (प्रूविंग) कर उन प्रतिक्रियाओं को एक पुस्तक फार्म में लाने में सफलता पायी और इस प्रकार पौधों के मानव गुणों का चित्रण सम्भव हो पाया !

- होमिओपैथी रिपर्टरी में मानव स्वाभाव के लाखों गुणों को दर्ज किया गया है और हर गुण के आगे कुछ दवाइयों के नाम दिए हैं !

- कोई भी अस्वस्थ व्यक्ति, चाहे बीमारी कोई भी क्यों न हो अगर अपना स्वाभाव और शरीर पर होने वाले वातावरण के प्रभाव के बारे में ईमानदारी के साथ सही सूचना प्रदान कर दे तो किसी भी होमिओपैथी डॉ के लिए उसका निदान बेहद आसान होता है !

-मगर उपरोक्त कार्य में एक विशेष व्यक्ति के स्वाभाव की होमेओपैथी दवा ढूँढने के लिए कम से कम २-४ घंटे का समय चाहिए अतः अगर सही पद्धति से अगर कोई प्रक्टिस कर रहा है तो वह डॉ एक दिन में अधिक से अधिक २ -३ रोगी को ही दवा दे पायेगा !

- एक बार अगर रोगी के स्वाभाव के आधार पर निकली हुई दवाएं, पूरे जीवन उसके कार्य आती रहती हैं !

अंत में क्या आप जानते हैं ...

-कि होमिओपैथी में अधिकतर दवाओं को शक्ति कहा जाता है और प्रयोशाला जाँच में इन दवाओं में किसी प्रकार का कोई दवा अंश नही मिलता ! हर दवा की टेस्टिंग रिपोर्ट सिर्फ़ "सुगर पिल्स विद अल्कोहल" ही आयेगा !

-कि होमिओपैथ के लिए आपकी वीमारी का नाम जानना अत्यन्त आवश्यक नही होता ! यहाँ पर दवा से बीमारी का इलाज़ न करके शक्ति( संजीवनी उस व्यक्ति विशेष की ) से रोगी की vital force का इलाज किया जाता है !
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