तेरी शर्ट हमसे ज्यादा सफ़ेद क्यों की तर्ज़ पर मीनारों और गुम्बदों को ऊँचा करने और सड़कों पर नमाज़ व आरती करने की आज होड़ लगी है.धार्मिक होने का प्रदर्शन खूब हो रहा है जबकि ऐसी धार्मिकता हमें धर्मान्धता की ओर घसीट ले जा रही है.जो खतरनाक है.देश की गंगा-जमनी संस्कृति को इससे काफी चोट पहुँच रही है.सर्व-धर्म समभाव हमारी पहचान है.सदियों पुरानी इस रिवायत को हम यूँही खो जाने नहीं देंगे. इस मंच के मार्फ़त हमारा मकसद परस्पर एकता के समान बिदुओं पर विचार करना है.अपेक्षित सहयोग मिलेगा, विशवास है. मतभेदों का भी यहाँ स्वागत है.वाद-ववाद से ही तो संवाद बनता है.





तू भी हिंदू है कहाँ, मैं भी मुसलमान कहाँ

on बुधवार, 12 नवंबर 2008

महिना हो आया.अब वक़्त ने मुहलत दी.यूं तंत्र ने मुझे रोकने की शपथ ले रखी थी.आज जनेयू के भाई रागिब के मेल ने इस पोस्ट के लिए विवश कर दिया.उन्होंने secularjnu का लिंक भेजा है.जब क्लीक किया तो इस नज़्म पर नज़र जा टिकी.भाई रागिब फोन पर अनुपलब्ध हैं अभी.वरना उन्हें मुबारकबाद ज़रूर देता.
बहरहाल इस नज़्म का लुत्फ़ आप ज़रूर लें.ये लुत्फ़ चिंतन तू की मांग करता है. -
सं
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तू भी हिंदू है कहाँ, मैं भी मुसलमान कहाँ


राम के भक्त कहाँ, बन्दा-ए- रहमान कहाँ
तू भी हिंदू है कहाँ, मैं भी मुसलमान कहाँ

तेरे हाथों में भी त्रिशूल है गीता की जगह
मेरे हाथों में भी तलवार है कुरआन कहाँ

तू मुझे दोष दे, मैं तुझ पे लगाऊँ इल्जाम
ऐसे आलम में भला अम्न का इम्कान कहाँ

आज तो मन्दिरो मस्जिद में लहू बहता है
पानीपत और पलासी के वो मैदान कहाँ

कर्फ्यू शहर में आसानी से लग सकता है
सर छुपा लेने को फुटपाथ पे इंसान कहाँ

किसी मस्जिद का है गुम्बद, कि कलश मन्दिर का
इक थके-हारे परिंदे को ये पहचान कहाँ

पहले इस मुल्क के बच्चों को खिलाओ खाना
फिर बताना उन्हें पैदा हुए भगवान कहाँ

साभार: शकील हसन शम्सी

ब्लाग जगत की सबसे अच्छी प्रतिक्रिया यहाँ देखिये !

on शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

२५ सितम्बर को फिरदौस ने लगता है अत्यन्त दुखी होकर एक पोस्ट लिखी " मार दो गोली, हिन्द के तमाम मुसलमानों को" उनके जवाब में बहुत से जागरूक साथियों ने प्रतिक्रियाएं दीं !

डॉ सुभाष भदौरिया, अपने देश भक्ति पूर्ण विचारों को व्यक्त करने के लिए मशहूर , एक बेहद तीखे ब्लागर, का, फिरदौस के उपरोक्त पोस्ट पर जाकर निम्न कमेंट्स देना ...

"कैसे कह दें कि तुम पराये हो,
तुम से नाता बहुत पुराना है।
तुम दिवाली पे अब के आ जाइयो,
ईद पे हम को अब के आना है।
आप की पोस्ट रुला गयी। ऐसी दिल तोड़ने वाली बातें मत कहिये "


डॉ सुभाष भदौरिया की हार्ड लायनर छबि और ऐसी मार्मिक अपील की पोस्ट लिखना , जैसे कोई सगा भाई, अपनी रोती हुई बहिन को मनाने की कोशिश कर रहा हो......

मैं भौचक्का रह गया , और अपने उस निर्णय के प्रति, जब कुछ लेख पढ़कर , मैंने डॉ सुभाष भदौरिया के ब्लाग पर ना जाने का फ़ैसला किया था ! हम कितने मूर्ख होते हैं कि दूसरे को ग़लत मानने से पहले, उसको अपना स्पष्टीकरण देने का मौका भी नही देते ! सोचने का सबका अपना नजरिया होता है और हमें विरोध का भी सम्मान करना आना चाहिए !

अपनी मूर्खता पर पछताते हुए हुए डॉ भदौरिया को मैंने यह मेल लिखा ...
" फिरदौस के ब्लॉग पर आपके यह कमेंट्स पढ़ कर यकीन नही हुआ कि यह वाक्य आपके ही हैं ! अतः दिल किया कि पहले मैं आपके प्रति ग़लत विचार रखने के लिए, आपसे क्षमा मांग लूँ !...बहुत पहले एक बार आपके ब्लॉग पर आया था, आपका लिखा कुछ पढ़ कर, आपके व्यक्तित्व के बारे में धारणा बना कर यहाँ से गया था, उसके बाद आपके ब्लाग पर नही आया ! हम लोग अक्सर यही गलती करते हैं, और अगर गलती का अहसास भी हो जाए तो भी गलती कभी नही मानते ! "

सुभाष जी का तुंरत जवाब आ गया !
"सतीशजी मैं पहले याहू पर लिखता था कुछ मित्रों के सुझाव से कि गुग्गल पर प्राया हिन्दी के रचनाकार हैं यहाँ विचारविनमय होगा इस दृष्टि से गुग्गल पर ही लिखने लगा। यहाँ देखा कि लोग खेमें में बँटे हुए आत्मरत हैं. जिस ग़ज़ल के अशआर आपने फिरदौस के ब्लाग पर पढ़े ये ग़ज़ल याहू पर इस पते पर प्रकाशित है. आपने मेरे बारें में धारणा बदली,अच्छी बात हैं.आप सह्रदय रचनाकार हैं आपके ब्लाग पर जाकर देखा तो ज्ञात हुआ.

पर हमारी सह्रदयता को कायरता मान कोई हिमाकत पर हिमाकत करता जाये तो रोष आता ही है।मैथलीशरणगुप्त ने जयद्रथ-वध खंड काव्य में सच ही कहा है-
निज शत्र का साहस कभी बढ़ने न देना चाहिए
बदला समर में बैरियों से शीघ्र लेना चाहिए।
पापीजनों को दंड देना चाहिए सचमुच सदा,
वरवीर क्षत्रियवंश का कर्तव्य है ये सर्वदा।
आपने टिप्पणी के माध्यम से मुझे याद किया। कृतज्ञ हूँ श्रीमान। "

डॉ सुभाष भदौरिया जैसे बड़े दिल वाले इंसान ही हमारे देश की शान हैं ! ऐसे लोगों के कारण हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों के साथ फलता फूलता रहेगा !

करिश्मा कुदरत का..

on रविवार, 5 अक्तूबर 2008



असाध्य रोग को आसानी से ठीक करने वाली चमत्कारिक चिकित्सा पद्धति - होमिओपैथी !

सतीश सक्सेना की कलम से

आज जब मैं कई घटनाओं के बारे में सोचने लगा जिनका सम्बन्ध बीमारियों से है.तो सहसा ख्यालआया कि कट्टरता वादियों से पूछूं भैया इनका धर्म क्या होता है.और जो दर्द है वो किस सम्प्रदाय का है. और जैसे-जैसे बीती-गुज़री बातें सामने आती गयीं जानकार अद्भुत शांति मिली कि कई असाध्य रोगों का उपचार जडी-बूटियों से हुआ और होता है.और प्रकृति तो सभी पर समान रूप से कृपालु रही है.

-१९९९ की बात है, अलका सक्सेना, उम्र ३३ वर्ष, क्रोनिक स्लिप डिस्क (तीन जगह) से पीड़ित, दर्द के कारण चलने फिरने में असमर्थ , पैर और हाथों में सुन्नपन का असर , चिंतित डाक्टरों ने ओपरेशन ही एकमात्र उपाय, बताया और साथ ही यह भी कि पेरालेसिस का खतरा है ! इस स्थिति में एक दिन इसको होमिओपैथी की एक रात ४-५ चीनी की गोलियां दी गयीं और अगली सुबह पहली बार यह लडकी बिना किसी सहारे के बिस्तर से उठाकर आराम से अचंभित होकर अपने पैरों पर खड़ी थी, और यही नही ३ दिन बाद वह शोपरस्टाप में विना किसी सहारे घूमने भी गयी ! आज भी उसकी एम् आर आई रिपोर्ट देख कर कोई डॉ इसपर विश्वास नही करते हैं !

- जम्मू के एक परिवार ने अपने ३ वर्षीया अस्थमेटिक बच्चे को सिर्फ़ ३ बार मीठी गोलियां खाकर, इस बीमारी से सदा के लिए मुक्ति पा ली वे आज भी होमिओपैथी के भक्त है ! -उपरोक्त उदाहरण, किसी भी अच्छे होमिओपैथ के लिए एक साधारण बात है ! मगर होमिओपैथी को सैकडों वर्षों साइंस ने मान्यता प्रदान नही की क्योंकि इसके सिद्धांत साइंस की अवधारणाओं से मेल नही खाते थे और वर्षों इस क्वेकरी ही मानते रहे ! आइये आज होमिओपैथी को समझने का प्रयत्न करें ...

-पौराणिक काल की एक घटना मेरे हिसाब से होमिओपैथी का सटीक उदाहरण है, जब लक्ष्मण को मरणासन्न अवस्था में देख वैद्य सुषेण ने कहा था कि सिर्फ़ संजीवनी पौधे से बनी दवा ही इनको बचा सकती है, क्योंकि लक्ष्मण का तेजतर्रार व्यवहार सिर्फ़ इस पौधे के व्यवहार से ही मेल खाता था !

-पैगम्बर मोहम्मद ने भी जडी-बूटियों की महत्ता ब्यान की . उन्हों ने खजूर, मेथी, कलौंजी आदि का इस्तेमाल कई बीमारियों में किया और इसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आये.

-डॉ जगदीशचंद बसु का एक प्रयोग, वनस्पतियों में जीवन पर किया था और इसे प्रमाणित भी किया था, उन्होंने यह भी सिद्ध किया था कि उनमे संवेदना, सुख और दुःख को महसूस करने की वही शक्ति और स्वाभाव है जो कि हम व्यक्तियों में है !

- होमिओपैथी का सिद्धांत है कि अगर आप किसी बीमार व्यक्ति का स्वाभाव जानते हैं तो उसी स्वाभाव के पौधे से बनी औषधि उस व्यक्ति पर संजीवनी सा कार्य करेगी चाहे बीमारी कोई भी क्यों न हो !

-सैकडों वर्ष इन महान होमिओपैथ डाक्टरों ने पौधों से बनाई गयी दवाईयों को अपने शरीर पर प्रयोग (प्रूविंग) कर उन प्रतिक्रियाओं को एक पुस्तक फार्म में लाने में सफलता पायी और इस प्रकार पौधों के मानव गुणों का चित्रण सम्भव हो पाया !

- होमिओपैथी रिपर्टरी में मानव स्वाभाव के लाखों गुणों को दर्ज किया गया है और हर गुण के आगे कुछ दवाइयों के नाम दिए हैं !

- कोई भी अस्वस्थ व्यक्ति, चाहे बीमारी कोई भी क्यों न हो अगर अपना स्वाभाव और शरीर पर होने वाले वातावरण के प्रभाव के बारे में ईमानदारी के साथ सही सूचना प्रदान कर दे तो किसी भी होमिओपैथी डॉ के लिए उसका निदान बेहद आसान होता है !

-मगर उपरोक्त कार्य में एक विशेष व्यक्ति के स्वाभाव की होमेओपैथी दवा ढूँढने के लिए कम से कम २-४ घंटे का समय चाहिए अतः अगर सही पद्धति से अगर कोई प्रक्टिस कर रहा है तो वह डॉ एक दिन में अधिक से अधिक २ -३ रोगी को ही दवा दे पायेगा !

- एक बार अगर रोगी के स्वाभाव के आधार पर निकली हुई दवाएं, पूरे जीवन उसके कार्य आती रहती हैं !

अंत में क्या आप जानते हैं ...

-कि होमिओपैथी में अधिकतर दवाओं को शक्ति कहा जाता है और प्रयोशाला जाँच में इन दवाओं में किसी प्रकार का कोई दवा अंश नही मिलता ! हर दवा की टेस्टिंग रिपोर्ट सिर्फ़ "सुगर पिल्स विद अल्कोहल" ही आयेगा !

-कि होमिओपैथ के लिए आपकी वीमारी का नाम जानना अत्यन्त आवश्यक नही होता ! यहाँ पर दवा से बीमारी का इलाज़ न करके शक्ति( संजीवनी उस व्यक्ति विशेष की ) से रोगी की vital force का इलाज किया जाता है !

पंडित-पुरोहित के बिना उर्स मुकम्मल नहीं होता

on मंगलवार, 16 सितंबर 2008

हिन्दू भी रखते हैं रोज़ा



आज मुल्क के दुश्मन तरह-तरह की आतंक कारी गतिविधियों द्बारा हमें बांटने में लगे हैं.वहीँ हम ब्लोगेर-मित्र भी इक-दूसरे को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं.अगर दरहकीक़त ऐसा कर रहे हैं तो अप्रत्यक्ष सही हम उन देशद्रोहियों के मकसद को कामयाब कर रहे हैं.वो बम विस्फोट कर हमें एक-दूसरे से बाँटना ही तो चाहते हैं.ऐसे समय हमें अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए.ऐसे वक्त महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ , बिहार के लोग आश्वस्ति का गहरा एहसास करते हैं।
मुसलमानों का बहुत ही पाक महीना है रमजान.इस महीने आत्म-संयम पर विशेष बल दिया गया है।
मराठवाडा के दौलताबाद के इलाके में हिन्दू भी रोजे रखते हैं.ये पूरा अंचल ही हिंदू-मुस्लिम एकता का ज़िंदा सबूत है.दोनों समुदाय के लोग समानांतर पूजा-अर्चना करते हैं और ऐसा आज से नहीं सदियों से करते आ रहे हैं।
दौलताबाद के चाँद बोघ्ले दरगाह में कोई जाकर देख सकता है कि कुरआन का पाठ यानी तिलावत और भजन-कीर्तन अगल-बगल होते रहते हैं.चाँद बोघ्ले भक्ति संत एकनाथ के गुरु थे पर कोई नहीं जानता कि वोह हिंदू थे या मुसलमान.लेकिन इनके प्रति श्रद्धा दोनों समुदाय में समान है.कभी कोई विरोध नहीं.कोई चादर चढाता है तो कोई अपने ढंग से अर्चना करता है.कितनी सुखद अनुभूति है कि आस-पास रहने वाले बहुसंख्यक हिंदू भी रमजान में रोजे रखते हैं।
मराठवाडा के ही खुल्दाबाद स्थित परियों का तालाब में दरगाह परिसर के मध्य शिवलिंग स्थापित है.दरगाह में लगे खम्बों पर हिंदू परम्पराओं के चित्र और नक्काशी अंकित है.जिसे देख कर कई पुरातत्त्व वेत्ताओं का सशंकित होना सहज है कि कहीं ये हिंदू मट्ठ तो नहीं.बावजूद इसके आज तक इसको लेकर न कोई विवाद हुआ और न कोई संघर्ष । दरगाह के वार्षित उत्सव यानी सालाना उर्स में दोनों समुदाय के लोग समान रूप से शिरकत करते हैं.और बिना ब्रह्मण पुरोहित की भागीदारी के कोई उर्स संपन्न नहीं होता।
मराठवाडा का पेठ ग्राम जो नांदेड तालुका में है , में कोई भी एक ही अहाते में मन्दिर-मस्जिद को देख सकता है।
अब छत्तीसगढ़ के सीमांचल जिला मुख्यालय रायगढ़ शहर चलें।
यहाँ एसपी कोठी के बिल्कुल पास ही है मुस्लिम-संत सैयद नज़रुल्लाह की मजार.वर्षों तक इसकी देखभाल एक पंडित जी करते रहे.हालांकि मजार की देख-रेख के लिए स्थानीय जामा मस्जिद ट्रस्ट जिम्मेवार है.और ट्रस्ट भी अपना फ़र्ज़ निभाता ही है.लेकिन पंडित जी अपनी भक्ति में मस्त रहा करते.अज पंडित जी नहीं रहे लेकिन उनके वंशज आज भी उतनी ही श्रद्धा से इस साझी-परम्परा को निभा रहे हैं।
चंपारण बहुत ही चर्चित अंचल है.गाँधी जी ने अपने स्पर्श से इसे अमर कर दिया.पूर्वी चंपारण का जिला मुख्यालय है शहर मोतीहारी.यहाँ भी जामा मस्जिद और एक मन्दिर कि इमारत बिल्कुल पास-पास खड़ी है.ऐसे उदाहरण हमारे देश में कई मिल जायेंगे.आज हमें ऐसी ही रौशनी की तलाश है.जिस पर भी ये किरण पड़ती है वो आत्मविभोर हो उठ ता है।
भारतीय चिंतकों(इसे हिंदू न समझा जाय ) में मुझे विवेकानंद ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है.उनका कहना है: कट्टरवाद की बीमारी सबसे खतरनाक बीमारी है।
और हम उसे ही प्रोत्साहन देने में लगे हैं.जबकि एक कट्टरता दूसरी कट्टरता को जन्म देती है.सवाल हिंदू या मुस्लिम का नहीं बल्कि दोनों ओर से उठी कट्टरता को दबाकर उनमें देश के प्रति फ़र्ज़ को जगाने का है.आज देश में ही बैठे कुछ लोग दूसरों के बहकावे में आकर जो घृणित-कर्म में लगे हैं.हम उन्हें समझाएं और अगर वो न समझ पायें तो हम उन्हें कानून के हवाले कर दें.अगर अदालत उन्हें रिहा कर देती है.तो उन्हें हम देश की मुख्य धारा में लाने का प्रयास करें।
हमारा देश गाँधी और आजाद का है।
बिस्मिल और अशफाक का है।
जब बिस्मिल बीमार होते तो वोह अल्लाह-अल्लाह याद करते ।
और जब अशफाक बीमार पड़ते तो वोह राम-राम का जाप किया करते।
ये देश न किसी लादेन का है और न किसी गोडसे का
फिर विवेकानंद याद आ रहे हैं,उनका कहना था भारत के लिए वेदान्त मस्तिष्क है और इस्लाम देह।
अंत में यही कहूंगा:
ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम
सबको सम्मति दे भगवान्

सतीश सक्सेना की क़लम से : दिल से कहो !

on मंगलवार, 26 अगस्त 2008

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शाहजहांपुर जिले के गाँव गढिया रंगी में १५ दिसम्बर १९५४ को जन्मे

सतीश सक्सेना पेशे से सिविल इंजिनियर हैं.फिलहाल केन्द्र में सरकारी मुलाजिम हैं।
समाज की सेवा करना इनकी फितरत में शामिल है तो साहित्य इनका शौक .लेकिन इनका साहित्यिक लेखन भी जन-सेवा की ही श्रेणी में शुमार होता है। कुछ ग़ज़ल कुछ गीत !,मेरे गीत ! aur लाइट ले यार ! के मार्फ़त आप इनसे मुलाक़ात कर सकते हैं।
अपने बारे में उनका कहना है:
अपने बारे में लिखना बेहद मुश्किल कार्य है ....जब से होश संभाला, इस दुनिया में अपने आप को अकेला पाया ! माता, पिता,भाई कैसे होते हैं यह सिर्फ़ दोस्तों या अन्य रिश्तेदारों के घर ही देखा है! इतना छोटा था की उनका चेहरा भी याद नही ! शायद इसलिए दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील तथा भावुक हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आप को अकेला महसूस न करे, इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी, कहीं भी और किसी समय भी तैयार रहता हूँ ! बाकी, बड़ा हुआ तो दुनिया ने बहुत कुछ सिखा दिया ! मगर अकेला होने से, संघर्ष क्षमता अपने आप ही आयी और विद्रोही स्वभाव , अन्याय से लड़ने की इच्छा, लोगों की मदद करने में सुख मिलने लगा निरीहता, किसी से कुछ मांगना, झूठ बोलना बिल्कुल पसंद नही !
- जिनका कोई न हो ऐसे लोगों की मदद के लिए एक स्माल ट्रस्ट आंचल का होल्डिंग ट्रस्टी एवं चेयरमैन होने के नाते लोगों की सेवा करने के मौके मिलते रहते है !
-नियमित रक्तदान करना अच्छा लगता है, मृत्यु उपरांत शरीर के सारे अंग दान कर रखे हैं!
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हिन्दुस्तान की एक बच्ची ने एक शानदार लेख " हम एक हैं,तो एक होने से डरते क्यों हैं? " लिखा है, जिसे पढ़ कर दिल वाह वाह कर उठा ! मुझे याद है, वर्षों पहले मैं बिभिन्न आयोजनों एवं ट्रेड यूनियन मूवेमेंट्स के अवसर पर एक नारा देता रहा हूँ - आवाज दो - हम एक हैं ! अब यह हमारी अपनी लड़की कह रही है कि अगर हम एक हैं तो मिलते क्यों नही, पहचानते क्यों नही और जानने की कोशिश क्यों नहीं करते ! एक तीखा उलाहना हमें, अपने बड़े भाइयों को, याद दिलाने की कोशिश के लिए ! फिर यह सच्चाई मानने में डर क्यों की हम ने कभी अपने इन छोटे भाइयों के बारे में जानने की कोशिश नही की, जो अखबार एवं अन्य साधन बताते रहे, वही सच मान लिया गया ! अगर हमें किसी के बारे में जानने की उत्कंठा है तो पहले उसकी संस्कार और संस्कृति समझनी और जाननी पड़ेगी ! यह सच है की बहुसंख्यकों के स्कूल में साथ पढने से ये बच्चे हिंदू संस्कार एवं त्योहारों के बारे में काफी जानते और समझाते है, मगर मुझे नहीं लगता की हमारे बच्चे भी मुस्लिम त्योहारों या उनके महापुरुषों के बारे में जानते होंगे !

अपने अहसास और तकलीफ को बयां करना बेहद मुश्किल काम होता है और उससे भी अधिक मुश्किल होता है दूसरे की तकलीफ समझना और महसूस करना !यह हर एक के बस की बात ही नही! इस तकलीफ को समझाने के लिए साझा सरोकार चाहिए, एक जज्बा चाहिए जिसमे अपने घर से भेद भावः मिटाने की तमन्ना हो ! और यह काम हम लेखकों का होना चाहिए की वे इमानदारी के साथ सच को सच कहने की हिम्मत कर सकें ! और शुरुआत करें ईमानदारी के साथ गलती को महसूस करने की, जहाँ तक बात पहल करने की है, बड़े होने के नाते पहल हमें ही करनी चाहिए !


यह सच है की अधिकतर लोगो को मुस्लिम त्योहारों के बारे में कुछ नहीं मालूम और सीखने का प्रयत्न भी करें तो आपसी झिझक और दोनों पक्षों का तंगदिल नजरिया खुल कर बात ही नहीं करने देता ! आज भी इतने वर्षों के बाद कस्बों और शहरों में मोहल्ले बँटे हुए हैं, दुकाने, रिक्शे, और तांगे तक बंटे हुए हैं और हम स्वतंत्रता दिवस पर कह रहे हैं कि आवाज़ दो हम एक हैं ! और वह भी सिर्फ़ एक दिन कहने के लिए !

बहुत काम करना है इस विषय पर, और यह काम करने के लिए पहल करनी चाहिए लेखक वर्ग को ! जो ईमान दार हों वो आगे आकर हमारे घरों में गहरी जड़ जमाये इस बबूल ब्रक्ष को उखाड़ने का प्रयत्न करें ! तो देश ऋणी रहेगा अपने इन लेखक पुत्रों पर कि चलो कुछ तो अच्छा लिखा गया और अपने घर के लिए लिखा गया ! शहरोज का लेख साझा-सरोकार saajha-sarokaar पर छपे " है राम के वजूद पे हिन्दुस्तां को नाज़ " हो या रख्शंदा का " हम एक हैं,तो एक होने से डरते क्यों हैं? " हर एक लेख में एक ही चीत्कार है कि हम तुम्हारे हैं हमें अपना मानो ! हम हिन्दुस्तानी हैं, हिन्दुस्तानी रहेंगे और हिन्दुस्तानी मरेंगे ! हम चाहते हैं कि हमारे त्यौहार एक साथ मनाये जायें ! इसकी हर लाइन कह रही है कि श्री राम का आदर हम आपसे अधिक करते हैं और आइये आपको हम अपने इमाम्स एवं हज़रत साहेब के बारे में सब कुछ बताएं ! आइये हम आपको इस्लाम के अदब और कायदा के बारे में बताएं और हमारा यकीन करें की आप को बहुत अच्छा लगेगा !
और मेरा यकीन है कि एक बार आपको यह सब जानने के बाद लगने लगेगा कि इतनी भारी ग़लतफ़हमी और वह भी इतने लंबे समय से, कैसे चली आ रही थी ! और कारण जानने की कोई जरूरत भी नही है, जरूरत है सिर्फ़ ग़लतफ़हमी मिटाने की और दिमाग से सुने सुनाये,पढ़े पढाये अक्स मिटाने की ! जरूरत है अविश्वास छोड़ कर फैले हुए हाथों की और बढ़ कर उन्हें आगोश में लेने की !

है राम के वजूद पे हिन्दुस्तां को नाज़

on सोमवार, 18 अगस्त 2008

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है राम के वजूद पर हिन्दुस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं इसको ईमाम-हिंद
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश, मुहब्बत में फ़र्द था।

इकबाल की इक नज़्म से

हम में से सारे लोग इस वितंडा से वाकिफ ज़रूर होंगे कि विभाजन में उर्दू शायर इकबाल की भी भूमिका रही है।
भले हमारे होंठ उनकी अमर रचना सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा गाते-गाते न थकते हों। लेकिन नानक, राम और भी कई भारतीय अमर vइभुतियों पर अपनी ज़बान में इस कवि ने जो श्रद्धांजली अर्पित की , इस सम्बन्ध में अधिकाँश लोग अनजान होंगे।

जन्नत का निशाँ: हिन्दुस्तां

इसी तरह हम ये तो खूब जानते हैं की मुस्लिम शासकों ने भयंकर अत्याचार किए मानो दूसरे धर्म के शासक अतिशय विनम्र होते हों.ये जान ने की कोशिश नहीं करते कि कितने muslim बादशाहों ने मठ और मंदिरों के लिए ज़मीने दीं थीं। मुस्लिम राज-सत्ता के ही काल में देश की पहली सेकुलर ज़बान हिन्दुस्तानी , तब उसे रेख्ता/लश्करी आदि कहा जाता था.आज ये प्यारी ज़बान उर्दू और हिन्दी के नाम से अपने-अपने नए संस्कार में परवरिश पा रही है।
इस पहली भाषा का पहला कवि हुआ है अमीर खुसरू
इस सूफी-कवि का जन्म १२५३ ई में हुआ था और १३४५ ई में इनकी मौत हो गई ।
ये शा
यर
अपने मुल्क से बेपनाह मुहब्बत करता था.इश्क़ की दीवानगी में हिन्दुस्तां के फूलों, झरनों, परिंदों और सूफियों -संतों पर केद्रित उसने फ़ारसी में कव-रचना भी की.मैं पाने मुल्क से क्यों मुहब्बत करता हूँ के सवाल में वोह ख़ुद कहते हैं:
यह मेरा वतन-अज़ीज़ है और पैगम्बर-इस्लाम की इक हदीस है की रो से अपने वतन से मुहब्बत हमारे अक़ीदे ईमान /आस्था ) का हिस्सा है। दूसरी वजह यह है की हिन्दुस्तां के ऊपर ही जन्नत है।
आप आगे लिखते हैं कि जब आदम ने खुदा के हुक्म की उदूली की तो उन्हें धरती पर भेज दिया गया.और वो जगह हिन्दुस्तां ही है.उन्हें हिन्दुस्तां इसलिए भेज दिया गया कि जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और उपलब्धता के नज़रिए से हिन्दुस्तां अरब और दूसरे मुल्कों की धरती की अपेक्षा अधिक आरामदेह था।
आप देश को का जन्नत का निशाँ कहते थे। उन्हों ने इक परिंदे का भी भी ज़िक्र किया है जो जन्नत में होता है और वही परिंदा भारत में भी पाया जाता है। उन्हीं ने अपने पक्ष में इक और दलील दी है कि ईसायिओं के मुताबिक आदम को सांप ने बहकाया था और आदम के साथ सांप को भी धरती पर भेज दिया गया था। आप कहते हैं कि भारत में और मुल्कों की बनिस्बत सांप भी ज्यादा होते हैं।
उन्हें मलाल भी रहा कि अगर हिन्दुस्तानी फलों और फूलों का नाम विदेशी ज़बान में होता तो ये विश्व-विख्यात होते।









आज़ादी पर श्रद्धा की बानगी

on गुरुवार, 14 अगस्त 2008

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विदिशा में जन्म और शिक्षा-दीक्षा भी यहीं। दूर-दूर तक साहित्य और अदब-ऐ-चमन की रानायिओं से वास्ता नहीं .लेकिन सिंगापूर पहुंचकर आपने अपनी कलम से जन्मजात शायरा होने की सनद हासिल कर ली.electrononics में m.sc. श्रद्धा वहाँ इक स्कूल में हिन्दी पढाती हैं और अरबी की विधा ग़ज़ल में शायरी करती हैं।
ये ऐसी शख्सियत की हामिल हैं जिनकी रगों में देश की गंगा-जमनी तहज़ीब खूबतर होती है.इनकी ज़बान न अरबी-फ़ारसी की तरफ़दार है और न ही तत्सम को गले लगाती है.आप छंदों और उरूज़ के मामले में भी सदाशयी दृष्टि अपनाती हैं.आप उर्दू की बहरों के अनुशासन को तो अपनाती ही हैं , हिन्दी के मात्रिक छंदों से भी गुरेज़ नहीं करतीं।
आज हम आज़ादी का JASHN मानते हैं।
लेकिन किन शर्तों पर ये दिन नसीब हुआ।
कुर्बानियां कितनी हुईं।
और आख़िर बटवारे का दर्द।
अब आप श्रद्धा से ही रूबरू हों।
-शहरोज़
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मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए

कितने अल्हड़ सपने थे जो दॉर–ए- सहर में टूट गये
कितने हँसमुख चेहरे रोए, कितने घर बर्बाद हुए

नहीं थी कोई जाति पाती, न ही दिलों में बँटवारा
हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई, धरम अभी ईजाद हुए

कुर्बानी शामिल उनकी भी, क्यूँ आज पराए कहलाए
कालिख इक चेहरे की "क़ौम" पे, हम इतने जल्लाद हुए

हाथ बढ़ाओ , गले लगाओ, भेद भाव अब जाने दो
नमन हमारा हो उनको, जो भारत की बुनियाद हुए

वेद कुरआन : बहुत कुछ समान

on मंगलवार, 12 अगस्त 2008



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अल्लाह शब्द इलाह(पूज्य) से
बना है.ऋग्वेद १-१-२ में भी ईल शब्द का प्रयोग ईश्वर के लिए हुआ है.ईल का अर्थ भी पूज्यनीय होता है.
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जो मुसलमान किसी गैर-मुस्लिम नागरिक पर ज़ुल्म करेगा , उसके हक को मारेगा या उसकी चीज़ ज़बरदस्ती ले लेगा, तो मैं खुदा की अदालत में मुसलमान के विरुद्ध पेश होने वाले मुक़दमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक का वकील बनकर खड़ा हो जाऊँगा ।
--पैगम्बर हज़रत मुहम्मद स.
अगर कोई इसका ख्वाब देखता है कि सिर्फ़ उसीका धर्म बचा रह जाएगा और दूसरे धर्म नष्ट हो जायेंगे तो मैं दिल की गहराई से उस पर तरस ही खा सकता हूँ और यही बता सकता हूँ कि जल्द ही सभी धर्मों के ध्वजों पर, विरोध के बावजूद यह अंकित होगा कि लड़ाई नहीं दूसरों की सहायता, वैमनस्य नहीं बल्कि सद्भाव और शान्ति।
--विवेकानंद
युगद्रष्टा विवेकानंद दरअसल सत्य से पूरी तरह परिचित थे। वे धर्म के मूल को जानते थे। मनुष्यत्व के प्रति आध्यात्मिकता, इसके अर्थ का उन्हें ज्ञान था । वे सच्चे अर्थों में ज्ञानी थे। वह जानते थे की वेद और कुरआन दोनों एकेश्वरवाद की शिक्षा देते हैं ।
वेद का उद्घोष है:
इक सदविप्रा:बहुधा वदन्ति
कुरआन का फ़रमान है:
वहदहु ला शरीक
आज हम धर्म के यथार्थ पक्ष से बिल्कुल अंजान हैं और अज्ञानतावश धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर देश-समाज में वैमनस्य, नफरत और हिंसा को प्रश्रय दे रहे हैं।
इस्लाम के कथित जिहादियों को अपने प्यारे नबी का ऊपर दिया क़ोल ज़रूर पढ़ना चाहिए और जेहन-नशीं कर लेना चाहिए जो दीन का परचम बेक़सूर बच्चों , महिलाहों और पुरुषों की लाशों पर गाड़ना चाहते हैं।
सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ हैं वेद और पुराण जिसकी शिक्षा है : वसुधव कुटुम्बकम सर्व सुखिन
कुरआन कहती है: अलहम्दो लील-लाहे रब्बिल-आलमीन यानी तमाम प्रशंसाएं अल्लाह के लिए है जो सम्पूर्ण संसार का पालनेवाला है. वहीँ ऋग्वेद में लिखा है:माहि देवस्य सवितु :पारिष्टति: अर्थात इस संसार के बनने वाले के लिए प्रशंसा है।
कुरआन में दर्ज है:अर्रहमान इर्रहीम (जो पालनहार और कृपालु है )
ऋग्वेद में अंकित है:वसुर्द्यमान :(जो देनेवाला और कृपालु है )
कुरआन आगे कहती है:एह्दिनस सिरातल मुस्तक़ीम (सच्चे मार्ग का पथ-प्रदर्शक बन)
तो ऋग्वेद हमें बताता है:नय सुपथा राये अस्मान
विवेकानद ने कहा था , वेद की ओर लौटो
लेकिन आज हम न वेद की ओर हैं , न ही कुर्रान और दूसरे धार्मिक ग्रंथों की ओर।
हाँ अपने मतलब की चीज़ें उसमें से निकालकर उसका ग़लत-सलत अर्थ मनमाफिक लगाने की कुचेष्टा हम अवश्य करते हैं.और झूठे दंभ में जीते हैं।
नोट:पोस्ट में फॉण्ट के कारण वर्तनी में हुई अशुद्धिओं को सुधारकर पढ़ें।
समय-समय पर और भी वांछित बिन्दुओं पर यहाँ चर्चा करने का इरादा है.
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